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ब्रह्मा जी और सरस्वती माता को लेकर फैली भ्रांतियां! इन्हें कैसे दूर करें?

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<p style="text-align: justify;"><strong>Shastrartha:</strong> ब्रह्मा जी और ज्ञान की देवी मां सरस्वती को लेकर कुछ भ्रांतियां, जो अक्सर देखने और सुनने को मिलती हैं इन्हें शास्त्रीय प्रमाणों के द्वारा दूर करने का प्रयास करने वाले धार्मिक ग्रंथों के जानकार अंशुल पांडे बताते है कि-</p>
<p style="text-align: justify;">ऋग्वेद के (10.61.7) में लिखा है<br /><em><strong>प्रजापतिः स्वम दुहितर्म निष्क्रमण</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;">अथवा</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><em>प्रजापतिः स्वम दुहितरम भिधाद्यो(ऐतरेय 3/33)&nbsp;</em></strong></p>
<p style="text-align: justify;">अथवा</p>
<p style="text-align: justify;">पिता दुहितुर्माध्यत (शतपथ 1.7.4.1) का सरसरी तौर पर अर्थ ये हो सकता है प्रजापति अपनी कन्या के पीछे चले जा रहे थे और उन्होंने उसे गर्भवती किया. पिता पुत्री के इस विचित्र सम्बन्ध का उल्लेख भागवत पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी है. आगे लिखा है जब उनके पुत्र मरीचि आदि ने इस भूल का संकेत किया तब ब्रह्मा ने अपना शरीर त्याग दिया. इस प्रसंग से ब्रह्मा का शोधन हो गया.</p>
<p style="text-align: justify;">पर यह इसका मूल अर्थ नहीं है. वास्तव में इसका अर्थ वैज्ञानिक तत्वों के अनुसार दिया जा सकता है. सर्दी के प्रातःकाल में एक कोहरा जैसी चीज सूर्योदय के समय दिखती है. कभी कभी तो यह कोहरा इतना घना होता है कि सूर्य की किरणें नही दिखती. पेड़ों पर बहुत सारी ओस की बूंदे गिरी रहती हैं. यहां ब्रह्मा को सूर्य कहा गया है जैसे शतपथ (12.3.5.1) में, यो ह्यो व सविता स प्रजापतिः</p>
<p style="text-align: justify;">अथवा</p>
<p style="text-align: justify;">ताकराय (8.2.10) "प्रजापतिरवे सविता". उषा का जन्म सूर्य से होता है उसके बाद सूर्य निकलता है. आलंकारिक भाव में कहा गया है कि सूर्य उषा के पीछे जाते हैं जबकि जल वाष्प सूर्य किरणों &nbsp;से लिपटी रहती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">तां दिशो जगुहु घोरं नोहरम यद विदुस्तमह( भागवत 3.12.34) का अर्थ है जब ब्रह्मा अपना शरीर छोड़ते हैं तब दिशाएं उनसे लिपटे वाष्प को आत्मसात कर लेती हैं. इसे निहार कहते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सैकड़ों वर्ष पहले कुछ अलग-अलग मतों को मानने वाले कुछ लोगों ने इसकी आलोचना आरम्भ की तब कुमारिल भट्ट ने इसे वैज्ञानिक तर्क से इसका उत्तर दिया. ब्रह्मा उषा के पीछे पीछे जाकर बाद में अपनी लाल किरणे उनपर बिखेरते हैं. इसकी व्याख्या कुछ लोग अलग तरह से करते हैं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">भागवत पुराण में भगवान वेदव्यास ने उषा को तन्वी या सूक्ष्म या बारीक बताया है सूर्य किरणे ही मरीचि हैं. इस तथ्य के आधार पर हम आंख बन्दकर के कोई भी अतार्किक बात स्वीकार कैसे कर सकते हैं. झूठ को आधार बनाकर उसका उपहास उड़ाया जा सकता है पर शास्त्र कभी झूठे नही हो सकते. हमारे प्राचीन संतों ने प्रत्येक तथ्य का तार्किक विश्लेषण किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वेदों में ब्रह्मा को मन भी कहा गया है. गोपथ पुराण मे 2.10, ऊ 5.10 में कहा गया है मन एका ब्रह्म. उसमे सरस्वती को वाणी कहा गया है. पहले मन में विचार आता है जो आगे वाणी बनकर बाहर निकलता है. वाणी मन से पैदा होती है. वाणी और मन साथ आने पर शब्द निकलते हैं. यह इसका आध्यात्मिक पक्ष है जिसे ब्रह्मवैवर्त पुराण में कृष्ण ने राधा को समझाया था.</p>
<p style="text-align: justify;">मन स्वरूपो ब्रह्मा ज्ञान स्वरूपो महेश्वर.वागिष्ठात्री देवी या सा स्वयंचत सरस्वती(58,59 ब्रह्मवैवर्त पुराण)..</p>
<p style="text-align: justify;">अर्थात मन ही ब्रह्म है, वाणी सरस्वती है और ज्ञान महेश्वर है. मन वाणी का अनुशीलन करता है जबकि पुत्र ज्ञान इन्हें सावधान करता है. ऐसा भगवान वेदव्यास कहते हैं. ब्रह्म जब सर्जक बनता है तब वह ब्रह्मा बन जाता. पुत्रों से कोई सहयोग न मिलता देख वह स्वयम को दो में विभाजित करता है, पुरुष और स्त्री. ब्रह्माण्ड का निर्माण स्त्री और पुरूष के सहवास से हुआ. स्त्री बांयी तरफ से पैदा हुई वह वाक् या सरस्वती कहलाई. ब्रह्मा और सरस्वती को पुत्री और पिता इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनके प्रस्फुटन में एक विचित्रता थी. पर वास्तव में वे पति पत्नी हैं (इसका उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद में है और स्मृति को प्रथम प्रमाण मानना चाहिए).</p>
<p style="text-align: justify;">भौतिक जगत में ब्रह्मा और सरस्वती पिता पुत्री जैसे नजर आते हैं पर सूक्ष्म जगत में वे मानव जाति के निर्माता हैं. अपनी सीमाएं और नैतिकता बनी रहे इसलिए ब्रह्मा ने अपना शरीर त्याग दिया. उन्होंने सहवास द्वारा प्रजनन आदि की रीति इसीलिए आरम्भ की ताकि भविष्य में कोई भ्रांति न हो तो स्त्री पुरूष की रचना की.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">ब्रह्मा वैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 6 में वर्णित हैं के माता सरसवती अपनी कला अंश से भिन्न स्वरूप में प्रस्तुत है. भारतवर्ष में अपनी एक कला से पधारकर नदीरूप में प्रकट हुई उन्हें भारतीय भी कहा गया, कला अंश से माता सरस्वती गंगा, तुलसी और पद्यावती का भी रूप लिया, और भी कई ग्रंथो में कहा गया है की ब्रह्मा की पत्नि सरस्वती और पुत्री सरस्वती दोनों भिन्न है. सरस्वती माता के अनेक रूप ग्रंथो में मिलेंगे इसलिए यह कहना सरासर गलत है कि ब्रह्मा और सरस्वती के बीच कुछ ऐसा था जो नैतिकता के दायरे से बाहर था. सूक्ष्म जगत के देवता आत्मास्वरूप हैं तो उनमें भौतिक जगत के नियम लागू नहीं होता. यह कहना कि ब्रह्मा सरस्वती के पीछे भाग रहे थे बिल्कुल आधारहीन है. वे पति पत्नी थे और संसार की निर्मिति का कारण हैं.</p>
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<p><strong>[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]</strong></p>



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